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Friday, January 13, 2017

अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने वाले सरल उपाय

भारतीय सामाजिक परिदृश्य आज तेजी से बदल रहे है। आज कपल लिव इन रिलेशनशिप में रहते है और शादी से पहले शरीरक संबंध का चलन भी बढ़ रहा है इस वजह से कई बार ना चाहते हुए भी लड़कियां प्रेगनेंट हो जाती है। अनचाहे गर्भ में बढ़ोतरी की वजह से आज मार्किट में गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम के प्रयोग में काफी इजाफा हुआ है।


आज विवाहेतर संबंधों में रहने वाले कपल भी जल्द बच्चा नही चाहते है लेकिन गर्भ धारण के बाद वह गर्भपात की शरण में जाते है जिसका खामियाजा और परेशानी महिला शरीर को उठानी पड़ती है। मैरिड या अविवाहित गर्भधारण से बचने के लिए कई बार बिना डॉक्टरी सलाह लिए बिना मार्किट से कोई भी गर्भपात करने वाली गोली ले लेते है जिससे हार्मोन बदलाव हो जाते है और तो और कई बार भयानक स्थिति भी आ जाती है।

आज अविवाहित और विवाहित जोड़े नियमित उन तरीकों के बारें में जनाने का नियमित प्रयास करते रहते है। आइयें आपको कुछ ऐसे तरीके बताते है उनके उपयोग से अनचाहे गर्भ से बचा जा सकता है।

प्रोटेक्शन प्रयोग करें : अनचाहे गर्भ से बचने के लिए सबसे बेहतर है यौन संबंध से पहले प्रोटेक्शन का उपयोग जरुर करें। आप प्रोटेक्शन के लिए कंडोम और गर्भनिरोधक गोलियो को उपयोग में ला सकते है। गर्भनिरोधक गोलियों को लेकर स्त्री रोग विशेषज्ञ की सलाह पर ही लें। कंडोम की बात करें तो इसे गर्भ रोकने का सबसे सरल तरीका माना जाता है और आजकल कंडोम पुरुषों के साथ साथ महिलाओं के लिए भी उपलब्ध है।

सतर्क रहें : अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने लिए प्रारंभिक उपचार सबसे उत्तम है। बिना समय बर्बाद किए मेडिकल पर आसानी से उपलब्ध किट लाकर घर पर परीक्षण कर सकती है। परीक्षण करने के निर्देश पैकेट पर साफ़ लिखे होते थे। उन्नत परीक्षण के बाद अगर गर्भ रुक गया हो तो एचसीजी और सोनोग्राफी करा कर डॉक्टर की मदद लेना शुरू कर दें।

समय पर उपचार : अनचाहे गर्भ आने के बाद जल्द से जल्द उपचार शुरू कर दें क्योकि देर करने के बाद आपके स्वास्थ्य के लिए खतरा होने के साथ साथ यह जानलेवा भी हो सकता है।

तकनीक का प्रयोग : बर्थ कंट्रोल पिल्स के अतरिक्त डीएमपीए इंजेक्शन, वैजाइनल रिंग, बीड्स मेथड और कॉपर टी जैसी सुविधाओं को लाभ लेकर भी अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाया जा सकता है।
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Thursday, January 12, 2017

संकुचन से किस तरह महसूस होता है और संकुचन क्या है? संकुचन के प्रकार कितने है?

संकुचन मतलब शरीर से जन्म लेने वाले बच्चे को नीचे से बाहर की दुनिया में धकेलना होता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है जो शुरू होती है जब बच्चे का दिमाग माँ के शरीर को ये सन्देश देता है कि उसका दुनिया में आने का समय आ गया है।

पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के लिए गर्भावस्था का पूरा अनुभव, जिसमें संकुचन उठना तथा बच्चे को जन्म देना शामिल है, भावनात्मक रूप से काफी कठिन साबित हो सकता है। आपने शायद पहले ही सुना होगा कि संकुचन कैसी लगती हैं और आप निश्चित ही इस दौरान होने वाले दर्द के बारे में सोचकर विचलित भी हुई होंगी। लेकिन हमेशा इस बात को ध्यान में रखें कि हर महिला के लिए संकुचन का अनुभव बिल्कुल निजी होता है और यह कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें गर्भ में बच्चे की मुद्रा से लेकर आपके लेबर (labor) की तीव्रता तथा आप इसे लेकर शारीरिक और मानसिक रूप से कितनी तैयार हैं आदि चीज़ें शामिल होती हैं।
अतः दूसरों की कहानियां सुनकर चिंता ना करें और इस बात को ध्यान में रखें कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और माँ का शरीर संकुचन के बावजूद एक बच्चे को जन्म देने का काम काफी अच्छे से करता है.ऐसा माना जाता है कि संकुचन काफी दर्दनाक, शक्तिशाली और लम्बी होंगी। पर जैसे ही बच्चे का जन्म होता है तो आपका सारा दर्द और परेशानी दूर हो जाती है। संकुचन का दर्द आमतौर पर सामान्य दर्द से अलग माना जाता है क्योंकि इसके होने का कारण कोई संक्रमण या आपके शरीर में होने वाली कोई परेशानी नहीं है। बल्कि यह एक जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया है जो धरती पर जीवन को सफल बनाता है। अतः जब आप लेबर में रहती हैं तो इस बात को लेकर सुनिश्चित रहें कि आपके शरीर के साथ जो भी हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है और इसे लेकर चिंता करने की कोई बात नहीं है।
गर्भाशय एक शक्तिशाली मांसल भाग होता है और बच्चे के जन्म के दौरान यह सिकुड़कर बीच बीच में ढीला पड़ता है, जिससे आपका बच्चा गर्भनाल से नीचे आ सके। जैसे जैसे गर्भाशय की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, वैसे ही आपका पेट कड़ा होने लगता है और जैसे ही मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं, वैसे ही ये नर्म पड़ जाता है। यह सिकुड़ना और ढीला पड़ना अनवरत चलता रहता है और यह माना जाता है कि आपके शरीर में एक लहर जैसा भाव उठेगा जो आपको उच्च दर्द की सीमा तक ले जाकर धीमा पड़ जाएगा।

संकुचन के प्रकार (Types of Contractions)

संकुचन के तीन प्रकार होते है :-
  • अभ्यास संकुचन (Practice contractions) :- गर्भावस्था में देखभाल, अभ्यास संकुचन गर्भावस्था की अवधि के बाद किसी भी समय हो सकता है या नही भी हो सकता।
  • गलत संकुचन (False contractions) :- गलत संकुचन अनियमित है और सामान्य रूप से ये स्थिति बदलने के बाद बंद होती है कुछ गलत संकुचन असली संकुचन को जन्म दे सकते है लेकिन वे ग्रीवा का कारण नही है
  • वास्तविक श्रम संकुचन (Real labor contractions) :- वास्तविक श्रम संकुचन किसी भी स्थिति में हो सकता है, चाहे आप खड़े हो, बैठे हो या लेटे हो। यह समय के साथ गंभीर , नियमित और लगातार हो जाते है। संकुचन के साथ साथ ऐठन, पेट की खराबी और दस्त भी हो सकता है। जब ये समस्या होती है तो पीठ में, पेट में और उपरी जांघो पर दर्द होता है और पानी टूटने के रूप में झिल्ली टूटने के साथ साथ खून भी निकल सकता है।
  • समय संकुचन (Timing Contractions) :- समय संकुचन एक उपयोगी तरीका है, यह खोजने के लिए कि बच्चा पैदा होने में कितना समय है। गर्भवती महिलाओ को गर्भावस्था के अंत में और पुरे श्रम अवधि के दौरान संकुचन होते है ये तब तक होते है जब तक शिशु का जन्म नही हो जाता इस दौरान गर्भाशय की मांसपेशिया में खिचाव और ढीलापन समय समय पर होता है।

प्रसव से पहले – समय संकुचन करने के लिए विधि (Method to time contractions)

  • संकुचन को पहचानो (Recognize the contraction) – गर्भवती महिलाओं के लिए खास टिप्स, संकुचन हर महिला को एक अलग एहसास कराते है। कई महिलाओ द्वारा ये बयान किया जाता है, कि एक दर्द के रूप में ये वापस से शुरू होता है और पेट की ओर बढता है। दर्द शुरू में हल्का होता है और फिर यह ज्यादा हो जाता है और आखिर में कम होता है। संकुचन के दौरान पेट कठोर हो जाता है। प्रसव-वेदना की शुरुआत (prasav ke lakshan) में संकुचन पहले 60-90 सेकंड के लिए होता है और फिर आखिर में 15-20 मिनिट के लिए होता है। आवृत्ति के रूप में ये अवधि कम हो जाती है और प्रसव आने के करीब ये बढ़ जाती है।
  • समय संकुचन (Timing Contractions) – संकुचन के आकर को पहचानना है, तो संकुचन की आवृत्ति और अवधि पर ध्यान देना चाहिए। कभी कभी संकुचन एक मिनिट से पहले ही समाप्त हो जाता है तो इस स्थिति में सही समयमापक का होना बहुत जरुरी है। संकुचन शुरू होने और समाप्त होने का समय नोट कर लेना चाहिए दो संकुचन के बीच की अवधि पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। श्रम के ठीक पहले संकुचन एक निश्चित तरीके से होता है।
  • यह जाने की प्रसव-वेदना कब शुरू होता है (Knowing when the labor begins) :- यह प्रसव-वेदना (delivery se pehle) के संकेत का पालन करने के लिए आवश्यक है। ये संकेत किसी भी स्थिति में संकुचन को तेज़ रखने में शामिल है और वे सेट के तरीके का पालन करते है। वे आवृत्ति में वृद्धि करते है और अधिक दर्दनाक बन जाते है। प्रसव-वेदना के अन्य शारीरिक लक्षणों में पानी का टूटना और बच्चा गर्भाशय ग्रीवा के लिए नीचे कि ओर आगे बढना, शामिल है। इस दौरान गर्भाशय ग्रीवा में खून निकलने का फैलाव भी है।
  • यह जाने की जन्म की तैयारी कब करे (Knowing when to prepare for birth) :- प्रसव के समय होने वाली मजबूत संकुचन की अवधि 45 सेकंड और 3-4 मिनिट के बीच होती है।

संकुचन को ठीक कैसे करे (How exactly are contractions like?)

संकुचन गर्भाशय और ग्रीवा के आसपास के दवाब के कारण महसूस होता है। इस स्थिति में पेट नरम और कड़ा हो जाता है। कुछ महिलाओ को यह महसूस होता है कि पेट में एक कड़ी मुट्ठी बन रही है ,कुछ मामलो में पेट के आसपास ये कस थोड़े दर्द के साथ असहज महसूस होती है। यह बच्चे को गर्भ में खींचने और गर्भाशय पर दवाब डालने की तरह महसूस  होता है। हर महिला के संकुचन का अलग अनुभव होता है।

प्रसव से पहले – अलग अलग महिलाओ में संकुचन के अलग अलग अनुभव (Different experiences of contraction in different women)

  • आमतौर पर संकुचन पीठ में कुछ परेशानी के साथ अवधि में दर्द का एक प्रकार है और जिससे पेट पहले से और मजबूत हो जाता है, ये दर्द एक निश्चित तरीके से होता है।
  • कुछ महिलाओ के लिए संकुचन अवधि में बुरे दर्द की तरह है। ये पेट के निचले हिस्से और पीठ में ऐठन की तरह है।
  • कुछ महिलाए इस दर्द को पेट के कसने  के साथ महसूस करती है, यह कुछ सेकंड या एक मिनिट के लिए ही रहता है।
  • कई महिलाये संकुचन को पेट में हवा या गैस के रूप में महसूस करती है।
  • कुछ महिलाये संकुचन को मासिक धर्म में ऐठन जैसे धीरे धीरे महसूस करती है।

लेबर के विभिन्न चरणों में मरोड़ों का अहसास (Feeling of contraction at different stages of labor)

आपके लेबर में मौजूदा स्थिति के अनुसार संकुचन आने का अहसास बदलने की उम्मीद की जा सकती है। शुरुआत में संकुचन का दर्द मासिक धर्म के कठिन दर्द की भांति लगता है जिसके साथ शरीर में मरोड़ें उठना और पीठ में दर्द की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कुछ महिलाओं के लिए शुरुआत से ही दर्द काफी तीव्र रहता है। इसी के साथ ऐसी महिलाएं भी होती हैं जिनके लिए शुरुआत में संकुचन की प्रक्रिया पेट के निचले हिस्से में भारीपन के सिवा और कुछ भी नहीं होती। कईयों के लिए संकुचन सबसे पहले पीठ पर महसूस होता है और फिर पेट की तरफ जाता है एवं धीरे धीरे गर्भाशय में फ़ैल जाता है।
लेबर का समय गुजरने के साथ ही संकुचन और भी तीव्र तथा दर्दनाक होता जाता है और दो संकुचनों के मध्य का समय भी कम होता जाता है। जब माँ पूरी तरह डाईलेटेड (dilated) रहती है तो दोहरा संकुचन भी कई बार महसूस किया जाता है। दोहरे संकुचन के दौरान आप पाएंगे कि दर्द अपने चरम पर पहुंचकर धीमा हो जाता है, और फिर से अपने चरम पर पहुंचकर धीमा हो जाता है। इस स्थिति में लेबर का पहला चरण समाप्त होता है तथा दूसरा चरण शुरू होता है, जब आप बच्चे को नीचे धकेलने लगती हैं। इस चरण का संकुचन पहले चरण के संकुचन के मुकाबले अलग और कम दर्दनाक प्रतीत होता है। तीसरे चरण में प्लेसेंटा (placenta) गर्भाशय की दीवार से अलग हो जाता है और यह संकुचन पिछले चरणों के संकुचन के मुकाबले काफी कम तीव्र और दर्दनाक माना जाता है।
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Saturday, January 23, 2016

Dos and don’ts of fitness during pregnancy – गर्भावस्था के समय फिट रहने के नुस्खे

गर्भावस्था हर महिला के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह वह समय है जब शरीर में काफी सारे परिवर्तन होते हैं और एक लड़की सही मायनों में महिला बनती है। इस समय कई तरह के सवालों का ज़ेहन में उठना काफी सामान्य बात है और इसके जवाबों की खोज भी आपको अवश्य होगी।
फिटनेस, शारीरिक स्वास्थ्य और गर्भावस्था का सीधा सम्बन्ध सही खानपान और अच्छी जीवनशैली को अपनाने से जुड़ा हुआ है। शारीरिक फिटनेस से दिल, हड्डियां और मस्तिष्क स्वस्थ रहते हैं। गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए गर्भावस्था के समय क्रियाशील रहना आवश्यक है।
गर्भावस्था के वक़्त स्वस्थ खानपान काफी आवश्यक है। यह वह समय है जब आपके शरीर को आयरन, कैल्शियम और फोलिक एसिड की काफी ज़रुरत होती है। गर्भवती महिलाओं को कैलोरीज की भी काफी ज़रुरत होती है। ऐसा कहा जाता है कि एक गर्भवती स्त्री को दो लोगों का भोजन करना चाहिए। पर इसका यह मतलब नहीं है कि आप दोगुना भोजन करें। भोजन ऐसा होना चाहिए जो कि आपके बच्चे को भी पोषण प्रदान करे।

गर्भावस्था के दौरान पालन करने वाली चीज़ें (Dos during pregnancy)

  • गर्भावस्था के समय भी व्यायाम अवश्य करें। इससे लेबर और डिलीवरी के समय होने वाली तकलीफ और परेशानी काफी कम हो जाती है। हलके व्यायाम जैसे तैराकी, वाकिंग और योग करें।
  • अपने पेट और पीठ पर ज़्यादा दबाव ना डालें।
  • स्क्वैटिंग और प्लैंक्स करें तथा ऐसी मुद्रा बनाएं जिससे कि आप खड़े होकर तथा बगल की ओर झुककर व्यायाम कर सकें। पेट पर दबाव डालने से बच्चे तक रक्त का बहाव नहीं पहुँच पाता और इससे उसे नुकसान हो सकता है।
  • काफी मात्रा में पानी पियें और खुद को ठंडक प्रदान करें। डिहाइड्रेशन भ्रूण के लिए काफी खतरनाक हो सकता है।
  • पसलियों में दबाव डालने से बचने के लिए ढीले ढाले कपड़े पहनना ही बेहतर रहेगा।
  • अगर आपके सर्विक्स में कोई समस्या, खून निकलना, किसी तिमाही में कोई तकलीफ या गर्भावस्था के बाद के समय में खून निकलना, समय से पहले लेबर की समस्या या मेम्ब्रेन्स को हानि पहुँचने जैसी तकलीफों की स्थिति में अपने डॉक्टर से इलाज करवाएं।
  • अगर आपको लगातार सिर में दर्द, चक्कर आना, गुप्तांग से द्रव्य निकलने की समस्या, मांसपेशियों में कमज़ोरी, गर्भाशय में सिकुड़न, पेट में दर्द या पेल्विस में दबाव पड़ने जैसी समस्या है तो भी तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • गंभीर और अचानक हो रहे तनाव से आसानी से निपटने की कोशिश करें।
  • ऐसी गतिविधियों से दूर रहें जिससे माँ और बच्चे को हानि पहुँचने का ख़तरा हो।

गर्भावस्था के दौरान ना करने वाली चीज़ें (Don’ts During Pregnancy)

  • गर्म वातावरण में व्यायाम न करें। सिर्फ सुबह, शाम या एयर कंडिशन्ड जिम में ही व्यायाम करें।
  • भारी वज़न ना उठाएं, पेट या पीठ के बल ना लेटें तथा ऐसी मशीन का इस्तेमाल न करें जिसके अंतर्गत आपको अपनी कमर में बेल्ट बाँधने की ज़रुरत पड़े।
  • लम्बे समय तक खड़े रहने से परहेज करें। इससे गर्भाशय में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है और यह रक्त आपके पैरों में जाने लगता है, जिससे आपको चक्कर भी आ सकते हैं।
  • ज़्यादा दौड़ने भागने वाले गतिविधियों तथा खेल में हिस्सा न लें जिसमें आपके पेट के बल गिरने का ख़तरा हो, जैसे इन लाइन स्केटिंग, सॉकर, डाउनहिल स्कीइंग और घुड़सवारी।
  • डॉक्टर की सलाह के बिना किसी भी प्रकार की दवाई का सेवन न करें।
  • डॉक्टर से परामर्श किये बिना एस्पिरिन, आई ब्रूफेन जैसे पेनकिलर्स से परहेज करें।
  • कैलोरी का सेवन बंद न करें। दिन में कम से कम 300 से 500 अतिरिक्त कैलोरी का सेवन करें।
  • गंभीर बीमारियों जैसे मधुमेह और अस्थमा की दवाइयाँ लेना बंद न करें।
  • धूम्रपान से परहेज करें तथा अवैध ड्रग्स लेने से भी बचें।
  • हॉट टब तथा सॉना में नहाने से परहेज करें। इससे तापमान में काफी ज़्यादा वृद्धि हो जाएगी और भ्रूण के मस्तिष्क के विकास पर काफी बुरा असर पड़ेगा।
  • आयल वाले पेंट्स तथा लीड और मरकरी से युक्त पदार्थों का प्रयोग न करें।
  • बिलकुल थक जाने की सीमा तक व्यायाम न करें। व्यायाम करते करते भी बातचीत जारी रखें।
  • अपने वज़न के बढ़ने की बिलकुल भी चिंता न करें। एक बार बच्चे के जन्म के बाद आपका वज़न खुद ब खुद कम हो जाएगा।
  • घर बदलने या नौकरी बदलने जैसे अनावश्यक तनाव इस स्थिति में लेने से बचें।
  • डिलीवरी के वक़्त होने वाले लेबर तथा दर्द के बारे में सोचकर बिलकुल भी ना घबराने का प्रयास करें तथा इसे प्राकृतिक रूप से स्वीकार करें।
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इन तरीको से करे गर्भावस्था के बाद मोटापा कम

मां बनना बड़ा ही सुखद एहसास होता है, लेकिन उसके बाद जब शरीर भारी हो जाता है तब बड़ी परेशानी होती है। आप बहुत प्रयास करती हैं कि आपका वजन कम हो जाए लेकिन प्रेगनेंसी के बाद वजन कम होना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। लेकिन अगर आप अपनी डाइट में परिवर्तन ला कर रेगुलर एक्‍सरसाइज करें तो जरुर फरक पडे़गा।
इस समय में दौरान शरीर को सही शेप में बनाए रखना महिलाओं की मुख्य चिंता होती है क्यों कि इस समय पाचन और लाइफ़स्टाइल दोनों में इतने बदलाव हो जाते हैं कि अधिकतर महिलाएं प्रेग्नेंसी के बाद मोटी हो जाती हैं।
प्रेग्नेंसी के बाद वजन कम करना महिलाओं के लिए थोड़ा मुश्किल होता है क्यों कि प्रेग्नेंसी के बाद शरीर को रिकवर होने में थोड़ा समय लगता है और दूसरा इस समय व्यायाम पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाती हैं। चूंकि इस समय वे बच्चे को दूध भी पिलाती हैं जिससे उन्हें भूख भी ज्यादा लगती है। इसलिए ज्यादा खाना और व्यायाम नहीं करना आदि ऐसे कारण जिनसे महिलाओं में वजन बढ़ जाता है।
आपको ध्‍यान में रखना होगा कि वजन तुरंत नहीं घटेगा बल्कि इसके लिये कुछ महीने लगेंगे। आपको हर हफ्ते का प्‍लान बना कर चलना होगा, कि आप हर हफ्ते कम से कम 1 किलो वजन तो कम कर के ही रहेंगी। अगर आप ऐसा करने में कामयाब रहीं तो आप अपना वजन 6-8 महीने में ही कम कर लेंगी। अगर आपकी डिलवरी आपरेशन से हुई है, तो इस मामले में आपको अपने डॉक्‍टर से सलाह ले कर वजन कम करने की सोचनी चाहिये।

प्रेगनेंसी के बाद पेट कम करने के असरदार उपाय

कैलोरी का ध्यान:-
रखें अक्सर देखा गया है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं खाने की मात्रा लगभग दुगनी कर देती हैं। लोग कहते हैं कि इस समय उसे दो लोगों का पेट भरना है इसलिए ज्यादा खाना चाहिए, यह बात गलत है। उसे सिर्फ थोड़ी सी ज्यादा कैलोरी की आवश्यकता होती है।
ताज़ा फल खाए
ध्यान रहे जब भी आप फ्रूट्स खाए तो ताज़े ही खाए। इन्हे ज्यादा देर तक फ्रीज में न रखे और इनको हमेशा धो कर ही सेवन करे।
व्यायाम की कमी:-
प्रेग्नेंट महिलाओं को वॉक, योगा और ज्यादा कठिन व्यायाम करने की बजाय हल्के व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। कम एक्सर्साइज़ करने से भी प्रेग्नेंसी के बाद वजन बढ़ जाता है।
तनाव से दूर रहें:-
अच्छा खाना खाने के बावजूद भी तनाव आप पर विपरीत असर डालता है। चूंकि इस समय जीवनशैली में कई बदलाव होते हैं इसलिए थोड़ा तनाव आना लाज़मी है। इसलिए ज्यादा तनाव से स्ट्रेस हार्मोन स्त्रावित होता है जिससे मोटापा बढ़ता है। यदि आप माँ बनने वाली हैं तो तनावमुक्त रहें और हर पल का आनंद लें।
स्तनपान:-
यह न सिर्फ बच्चे के लिए अपितु माँ के लिए भी अच्छा है। ब्रैस्ट कैंसर से बचाव के साथ ही यह लटकता हुआ बेली वाला मोटापा कम करने के लिए भी बहुत अच्छा साबित होता है। जानिए स्तन का दूध बढ़ाने के आसान तरीके ।
स्वास्थ्यवर्धक और पोषक आहार:-
डिलिवरी के बाद के प्रभावों से बचने के लिए आहार और खान-पान मुख्य भूमिका निभाता है। इसलिए यह सलाह दी जाती है कि माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए माँ को स्वास्थ्यवर्धक और पोषक आहार लेना चाहिए। जंक फूड खाना और ज्यादा शुगर वाला खाना खाने से कैलोरी ज्यादा मिलती है जिससे मोटापा बढ़ जाता है।
थाइराइड की अधिकता:-
कुछ महिलाओं में प्रेग्नेंसी के बाद वजन बढ़ने का कारण हाइपोथाइराइड भी है। थायराइड हार्मोन का स्राव कम होने से भी महिलाओं में मोटापा बढ़ जाता है।
भरपूर नींद लें:-
डिलिवरी के बाद कम से कम 6 घंटे सोना जरूरी है। कम सोने से महिलाएं मोटी हो जाती हैं। यह भी प्रेग्नेंसी के बाद महिलाओं के मोटे होने का मुख्य कारण है।
आज आपने जाने गर्भावस्था के बाद पेट कम करने के असरदार उपाय। तो आज से ही इन् बातो का ध्यान रखे और अपनी प्रेगनेंसी के बाद इन नियमों का पालन करे ताकि आपको भी यह मोटापा की  प्रॉब्लम न सहनी पड़े।

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Monday, January 18, 2016

जाने गर्भावस्था के शुरुवाती लक्षण,प्रेगनेंसी है या नहीं

शादी के बाद हर औरत चाह रखती है, की उसकी गोद में भी नन्हा सा बच्चा हो| और ऐसा हो भी क्यों ना आख़िरकार घर में नन्हे मेहमान की चाहत तो सभी को होती है| गर्भवती होना किसी भी महिला के लिए बेहद ही खुशी का पल होता है| जब भी कोई महिला गर्भवती होती है तो उसका शरीर कुछ संकेत देता है, जिससे उसे पता चलता है की वो माँ बनने वाली है|
कभी कबार गर्भावस्था के प्रारंभिक लक्षण के बारे में जानकारी का अभाव होने के कारण महिलाएं ये नहीं जान पाती है, की वो माँ बनने वाली है, या नहीं| इसके लिए वो घर पे टेस्ट या फिर लैब में गर्भावस्था का परीक्षण करवाती हैं।
आज हम आपको कुछ ऐसी जानकारी देंगे जिसे जानने के बाद आप अपनी इस ख़ुशी को और दुगना कर सकती है। वैसे तो गर्भाशय किट के जरिये भी आप अपनी प्रेगनेंसी को सुनिश्चित कर सकती है| लेकिन अगर आप इसके बिना भी पता करना चाहती है तो आज हम आपको इसके लिए जानकारी दे रहे है|
प्रेगनेंसी के शुरुवाती हफ्तों के भीतर अगर आपको एक बार हलकी ब्लीडिंग हुई हो तो वो प्रेगनेंसी का लक्षण कहलाता है। दरहसल होता यह की प्रेगनेंसी के दौरान पीरियड्स रुक जाते है| इसलिए कई बार पीरियड्स ना आने पर महिलाओं को यह लगने लगता है, की वो गर्भवती होने वाली है| लेकिन ऐसा नहीं है, क्युकी पीरियड्स रुकने के और भी कई कारण हो सकते है। 

जी मचलना और उल्टियाँ होना

गर्भावस्था के आठवे सप्ताह में ही जी मचलना शुरू हो जाता है, और उसी दौरान उल्टियाँ भी होने लग जाती है, जो दिन में, दोपहर में, और रात में, तीनो समय में कभी भी होने लगती है। इस तरह शरीर आपके गर्भ में बच्चा होने का संकेत देता है। ऐसी दिक्कत छठे महीने के बाद कम होने लगती है, तो ऐसे समय में हल्का भोजन ही करे जिससे आपकी पाचन क्रिया सही तरीके से चल सके।

अचानक मूड बदलना

महिलाओं का प्रेगनेंसी में मूड अचानक से ख़राब हो जाना, और अचानक से सही हो जाता है| यह भी प्रेगनेंसी के शुरुवाती दौर का लक्षण है। तो ऐसे समय में अपने पति से अपनी बातो को शेयर करे| ताकि वो आपकी हर समस्या को ठीक से समझे और आपका गर्भावस्था में सहारा बने।

साँस लेने में तकलीफ

अगर आपको सांस लेने में तकलीफ हो रही है, तो इसका मतलब यह है की बच्चा आपसे सारी ऑक्सीजन ले रहा है। क्युकी इस दौरान शिशु बढ़ने लगता है। इससे फेफड़ों और डायाफ्राम पर भी दबाव पड़ना शुरू हो जाता है।

सिरदर्द

गर्भावस्था के प्रारंभिक लक्षण में सिरदर्द भी शामिल है, क्युकी इस समय में हार्मोन का बदलाव होता है, जिसके चलते सर्द दर्द जैसी समस्याए देखने को मिलती है|

पीठदर्द

गर्भावस्था में अक्सर पीठ दर्द होना आम होती है, इस दौरान आपके लिग्मेंट्स लूज़ होने लगते है, ऐसा होने के कारण आपका वजन भी बढ़ने लगता है, और आपका पोस्चर भी चेंज होने लग जाता है।

पाचन में परेशानी

प्रेगनेंसी के छठे महीने में आपको सीने में दर्द, एसिडिटी, पाचन में परेशानी जैसी और भी कई दिक्कते आने लगती है। इन सभी का प्रमुख कारण यह है, की इससे आपके शरीर में होने वाले हार्मोनल का बदलाव होने लगता है।

कब्ज

गर्भावस्था में कब्ज तो स्वाभिक होता है, क्युकी इस दौरान पेट फूलने लग जाता है, और इस वजह से आपका शरीर फूलने लग जाता है। जो की पाचन क्रिया पर भी गलत असर दाल सकता है।कब्ज भी Sign of Pregnancy है|

स्तनों में भारीपन
आपको यदि सुबह उठते से ही स्तनों में भारीपन या ब्रा के अंदर भारीपन लगता है,  या फिर आपके स्तनों के आकर में परिवर्तन आया है, निपल्स के आसपास वाले हिस्से में कालापन आ गया है तो घबराये मत क्युकी यह सब गर्भावस्था के लक्षण होते है।  तो इससे राहत पाने के लिए आरामदायक ब्रा पहने और खुद को रिलैक्स फील करे।

गर्भावस्था के अन्य लक्षण:-

  • बिना काम के भी शरीर में थकान महसूस करना।
  • बार-बार पेशाब आजाना।
  • सादा खाना पसंद नहीं आना।
  • खुशबू सूंघने के मन होना।
  • बार बार भूख लगना|
  • त्वचा में परिवर्तन आना भी प्रेगनेंसी का संकेत देता है।
  • स्तनों में भारीपन लगना, साँस लेने में तकलीफ होना।
  • शरीर में ऐंठन आजाना और पेट का फूलना।
  • पुरे शरीर में दर्द जैसे की सर, पेट, कमर आदि में दर्द का होना।
  • सुबह के समय कमजोरी महसूस होना और तबियत ठीक नहीं लगना|
  • अचानक चक्कर आ जाना, जी मचलना और उल्टियां गर्भावस्था का लक्षण है।
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    प्रारंभिक लक्षण जिससे पता चलता है आप गर्भवती है

    क्या आप गर्भवती है ? इस बात का संकेत आपको पीरियड के एक या दो सप्ताह लेट होने के बाद ही चलता है लेकिन अगर आप मासिक धर्म चक्र का ट्रैक रखना भूल गयी या फिर आप इसका ट्रैक ही नही रख रही है तो सिर्फ पीरियड की अवधि की उम्मीद में गर्भावस्था के लक्षण का पता नही लगा सकती है।


    यकीनन घर पर प्रेगनेंसी किट गर्भावस्था परीक्षण के लिए पक्का सबूत है पर महिलाओं से मिलें अनुभवों के अनुसार नीचे दिए कुछ लक्षणों को शेयर किया गया है जिनकी मदद से मासिक धर्म की ट्रैक भूल के बिना भी घर पर पता लगाने में आसानी होगी कि आप गर्भवती हो सकती है या नहीं।




    स्तनों में सूजन : स्तनों में वृद्धि गर्भावस्था के प्रारंभिक लक्षणों में से है और ऐसा हार्मोन के स्तर में वृद्धि की वजह से होता है। बॉडी के इस संवेदनशील भाग के वृद्धि का अहसास जल्द महसूस होने लगता है।

    थकान : हार्मोन प्रोजेस्टेरोन की तेजी से बढ़ते स्तर की वजह से आपको अचानक थकान पहले की अपेक्षा जल्दी महसूस होने लगती है। जल्दी थकान प्रेगनेंसी के लक्षण नही है लेकिन गर्भावस्था होने पर हार्मोन की वजह से जल्दी थकान आती है।




    मतली या उल्टी : घरों में या आज भी गांवों में ज्यादातर प्रेगेंट महिलाओं की पहचान इसी तरकीब के द्वारा की जाती है। ज्यादातर गर्भाधान करने वाली महिलाओं को सुबह के समय मिचली या उलटी की शिकायत होती है लेकिन गर्भावस्था से संबंधित मतली और उल्टी की समस्या सुबह, दोपहर या रात को भी हो सकती है।




    भोजन की रुचि में परिवर्तन: आप नव गर्भवती होती है तो आपकी पसंदीदा सैंडविच कॉफी अन्य सादे खाने में आपकी अरूचि झलकने लगती है। ऐसा तेजी से सिस्टम में एस्ट्रोजन की मात्रा में वृद्धि का प्रभाव से होता है। प्रेगनेंसी आने के बाद महिलाओं का जी चटपटे भोजन की तरफ बढने लगता है अचानक खाद्य पदार्थों में आया बदलाव भी गर्भवती होने की निशानी होता है।




    पेट में सूजन : गर्भावस्था में थोड़ी अवधि के बाद ही हार्मोनल परिवर्तन की वजह से पेट फूलना शुरू होने लगता है और इसी कारण पाचन क्रिया भी बिगड़ने लगती है। गर्भावस्था में कब्ज और पेट ऐंठन महसूस की शिकायत होना आम बात है। अगर आपके पीरियड लेट है और आपके कपड़ो की फिटिंग खराब हो रही है तो यह प्रेगनेंसी के लक्ष्ण है।




    पेशाब का बार-बार आना : गर्भवती बनने के फौरन बाद बाथरूम के लिए जल्दी-जल्दी जाना पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योकि गर्भावस्था के दौरान बॉडी में अतिरिक्त तरल पदार्थ निकलता है जिससे मूत्राशय पर प्रेशर बढ़ता है और बार-2 पेशाब के लिए जाना पड़ता है।




    शरीर का तापमान उच्च हो जाना : गर्भवती होने के बाद बॉडी का तापमान सामान्य से थोडा अधिक बढ़ जात है अगर यह 18 दिनों तक कायम रहता है तो यह गर्भावस्थात के प्रारंभिक लक्षण है।




    बॉडी में दर्द : प्रेग्नेंिट होने पर हार्मोन में परिर्वतन होना स्वाभाविक क्रिया है और इसी क्रिया के कारण सिरदर्द और पीठदर्द की समस्या उत्पन्न हो जाती है। गर्भावस्था में मन भी चंचल हो जाता है और एक काम में मन नही लगता है।




    उपर दिए गयें उपायों की मदद से आप गर्भावस्था के प्रारंभिक लक्षण तो जान सकती है पर गर्भावस्था को पुख्ता करने के लिए घर पर एक प्रेगनेंसी टेस्ट कर लें यह बहुत ही आसान होता है। पेशाब की बूंदों को प्रेगनेंसी किट के अंदर डाल कर पॉजिटिव या निगेटिव परिणाम की परीक्षा करें। घरेलू प्रेगनेंसी किट से कुछ क्षणों में ही पक्का पता चल जायेगा कि आप गर्भवती है या नही।
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    गर्भवती महिलाएं भोजन में इन आहारों से रखें परहेज



    अगर आप गर्भवती है और किसी बच्चे को नया जीवन देने वाली है तो आपको अपनी लाइफस्टाइल के साथ अपनी फूड् लिस्ट का भी खास ध्यान रखना चाहिए क्योकि अगर आप खाने पीने में लापरवाही करती है तो आप बीमार हो सकती है जिसका नुकसान गर्भ में पल रहे बच्चे को भी उठाना पड़ सकता है। आप जो भी भोजन ग्रहण करें वह ताजा और पूरी तरह पकाया हुआ हो इसके अलावा आपको अतिरिक्त ध्यान के लिए उन खाद्य पदार्थ को भी सुनिश्चित करना होगा जिसका सेवन आप गर्भावस्था के दौरान नही करना चाहिए या कम करना चाहिए।




    कैफीन : गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अधिकतर घर में रहना पड़ता है जिसकी वजह से सुस्ती और कामकाजी महिलाओं को घर में बोरियत का अहसास होता है और ऐसे में कॉफी, चाय, कोला या ऊर्जा वाली बजारी पेय अपनी डाइट में सामान्य से अधिक बढ़ा देती है जिससे गर्भपात का खतरा और अन्य स्वास्थ्य नुक्सान का सामना करना पड़ सकता है इसके अलावा गर्भ के पहली तिमाही के दौरान कैफीन का अधिक सेवन हरगिज नही करना चाहिए।




    सॉफ्ट पनीर : कई बार गर्भवती महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है और ऐसे में खाद्य जनित बीमारियों से ग्रस्त होना काफी आसान हो जाता है इसलिए सॉफ्ट पनीर का सेवन से परहेज करना चाहिए और अगर खाना पड़ भी जाए तो इसे अच्छी तरह पका कर ही खाना चाहिए। सॉफ्ट पनीर के अलावा नीले पनीर और बजारी पुराने पनीर में कई हानिकारक बैक्टीरियां उत्पन्न हो जाते है इसलिए सफेद छिलके के साथ पनीर अर्थात सॉफ्ट पनीर का प्रयोग पूर्ण सावधानी से करना चाहिये और एतिहत के तौर पर अगर पहले तिमाही इसका सेवन ना किया जाए तो ज्यादा अच्छा है।




    मांस मछली अंडे : मांस मछली अंडे से बेशक प्रोटीन और विटामिन के महत्वपूर्ण हो और इन भोज्य पदार्थो को बेशक अनगिनत फायदे हो लेकिन गर्भवती होने पर इनकी कटौती करना ही बेहतर है। मछली का सेवन गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग में बाधा पैदा कर सकता है क्योकि कुछ मछलियों में मरक्युरी होती है इसके अलावा अंडे सलमोनेल्ला बैकटीरिया से ग्रस्त होते है जो शरीर में कई बिमारियों का कारण बनते है। मांस वैसे भी अधिक गर्म भोजन होता है और पहले तिमाही पर इसका सेवन करने से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा अगर आप मार्किट में बने मांस या मछली का प्रयोग करती है तो संक्रमण और स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा अधिक बढ़ जाता है।




    शराब और सिगरेट छोड़ दे : शराब और सिगरेट का सेवन हर लिहाज से बुरा है लेकिन आज की भागदौड लाइफ में यह महिलाओं की लाइफस्टाइल में शामिल है लेकिन गर्भावस्था में इनका अधिक प्रयोग भ्रूण में पल रहे बच्चे को मानसिक तौर पर विकलांग,शारीरिक असामान्यताएं और उसके विकास तंत्र को प्रभावित कर सकता है।


    जो महिलाएं गर्भवत के समय में शराब और सिगरेट पीती है उनके व्यवहार समस्याओं में भी असमानता आ जाती है इसलिए कुछ देशों में गर्भवती महिला के शराब और सिगरेट पर प्रतिबंध लगायें गये है।





    अपने थाली से गायब करें इन खाद्य पदार्थों को : जो महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान मिसकैरेज का सामना कर चुकी है महिलाओं को अपने खाने की थाली से बैंगन, मिर्ची, प्याज, लहसुन, हिंग, बाजरा, गुड़ जैसे खाद्य पदार्थो को गायब कर देना चाहिए या बहुत ही कम प्रयोग में लाना चाहिए।


    इन खाद्य पदार्थो के अलावा फलों में पपीते ,अंगूर,अनानस जैसे फलों का सेवन बड़ी सावधानी से करना चाहिए क्योकि इन फलों के कच्चे होने पर हानि पंहुचा सकते थे।


    प्रेगनेंसी में खान-पान का ध्यान रखते हुए मसालेदार भोजन और मैदे से बने भोजन से परहेज ही गर्भावस्था स्वास्थ्य के लिए बेहतर है।


    प्रेगनेंसी के समय जो भी खाएं वह साफ़ सुधरा और पूर्ण रूप से पका हुआ हो, भोजन में जायफल और अधिक शक्कर की मात्रा वाले भोजन को भी अपनी दिनचर्या डाइट में सुझबुझ के साथ ही करें।
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    Sunday, January 17, 2016

    मिसकैरेज अर्थात गर्भपात होने के प्रमुख कारणों की लिस्ट

    नवजात शिशु को जीवन में लाने की योजना पर उस वक़्त पानी फिर जाता है जब गर्भवती महिला का गर्भपात अर्थात मिसकैरेज हो जाता है। प्रेगैंसी की अधिक ख्वाइश के बाद अगर मिसकैरेज होता है तो गर्भपात अवसाद महिला के अंदर क्रोध, भय,अपराध विनाशकारी भावनात्मक नतीजों को जन्म देने के साथ-साथ उनको मानसिक रूप से भी प्रताड़ित करता है।



    गर्भावस्था के नुकसान के कठिन पहलुओं से लगभग सभी अवगत है लेकिन पूर्ण जानकारी लेकर माता-पिता के मिसकैरेज दर्द को कम किया जा सकता है। आइयें जानते है आनुवंशिक वजह ना होने पर वो कौन-कौन से कारण है जिनकी वजह से गर्भपात या मिसकैरेज हो जाता है।



    प्रमुख शारीरिक कमियां और बीमारियाँ जिनकी वजह से होता है मिसकैरेज।




    महिला का स्वास्थ्य : गर्भवती होने से स्वस्थ बच्चे को जन्म देने तक की प्रक्रिया में महिला का स्वस्थ्य अहम भूमिका अदा करता है इसलिए गर्भवती महिला शारीरिक रूप से एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। कोई बड़ी बीमारी जैसे हार्ट की या ब्लड प्रेशर,शुगर,किडनी की तकलीफ या फिर यूट्रस से संबंधित रोग होने पर मिसकैरेज अर्थात गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है।






    क्रोमोजोम असामान्यता : क्रोमोजोम अर्थात गुणसूत्र असामान्यता भी मिसकैरेज की अहम वजहों में है। हाथ नीचे, एक गर्भपात में अंडे या भ्रूण गठन के दौरान शुक्राणु के गुणसूत्रों के साथ समस्या सबसे गर्भपात होने के सबसे आम कारणों में है। गुणसूत्रों अगर डीएनए के ब्लॉक कर रहे है तो बच्चे के रंग आंखों के विकसित होने में काफी दिक्कत आती है। सामान्य रूप से विकसित ना होने या भ्रूण के सक्षम ना के होने के परिणामस्वरूप मिसकैरेज हो जाता है।


    एक अनुमान के अनुसार प्रेगनेंसी की शुरुआती अवस्था मिसकैरेज वाले दो-तिहाई जोड़ो में गुणसूत्र असामान्यताओं की संभावना को माना गया है।




    नाल में दिक्कत : बच्चे के लिए रक्त की आपूर्ति को मां से करने वाले अंग का नाम नाल है अगर नाल के विकास में समस्या होती है तो भी गर्भपात होने का खतरा बना रहता है।



    खून में कमी : जिन महिलाओं में शरीर में खून की कमी होती है उनका भी मिसकैरेज गर्भवस्था की शुरूआती अवस्था में हो जाता है क्योकि खून की कमी की वजह से फ़ीटस का पूर्ण विकास संभव नही है।





    कमजोर गर्भाशय ग्रीवा : कुछ मामलों में गर्भाशय ग्रीवा की मांसपेशियों को सामान्य की तुलना कमजोर पाया जाता है जिस वजह से गर्भ पूर्ण रूप से नही ठहर पाटा है और मिसकैरेज हो जा है। समाज में कमजोर गर्भाशय ग्रीवा को अक्षमता के रूप में जाना जाता है।


    थायराइड विकार : थायराइड बहुत कम या बहुत अधिक हो दोनों ही रूप में यह बांझपन की समस्याओं को जन्म देता है या फिर मिसकैरेज का कारण बन सकता है। अगर थायराइड कम होगा तो हार्मोन उत्पादन की भरपाई करने की कोशिश करेंगे जिससे ओवुलेशन को दबा सकते हैं इसके विपरीत थायराइड अधिक होगा तो बहुत सारे हार्मोन का उत्पादन करेंगा गर्भाशय बनाने पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते और वह एस्ट्रोजन की क्षमता के साथ हस्तक्षेप कर गर्भाशय से खून बहाने का नेतृत्व कर सकते हैं जिससे गर्भपात का खतरा बन जाता है।




    मधुमेह : अनियंत्रित मधुमेह ज्यादातर गर्भपात का कारण बनता है। जो महिलायें प्रेगेनेंट हो उन्हें रक्त में A1C शर्करा को नियंत्रित करने के साथ-साथ रक्त शर्करा रक्त परीक्षण की जाँच भी समय-समय पर कराते रहना चाहिए।




    डेंगू : ताजा रिपोर्ट के अनुसार नवजात शिशुओं को गर्भ में पाल रही उन महिलाओं के मिसकैरेज में वृद्धि हुई है जो डेंगू से पीड़ित होती है। डेंगू प्लेटलेट स्तर में गिरावट का कारण बनता है इसलिए गर्भवती महिलाओं में भारी रक्तस्राव का खतरा बढ़ जाता है। गर्भ के पहले दो हफ्तों के दौरान बीमारी विकसित होती है तो गर्भपात का खतरा सबसे अधिक हो जाता है इसलिए गर्भवती महिला के डेंगू होने पर जल्द से जल्द अच्छे डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।


    उपरोक्त बीमारियाँ को अतिरिक्त कुछ अन्य बीमारियाँ नीचे दी गयी है जो गर्भपात की वजह बनती है।


    • गुर्दे की बीमारी


    • कोएलियाक बीमारी


    • बैक्टीरियल दिक्कत


    • क्लैमाइडिया


    • एचआईवी


    • गानरीअ


    • सिफलिस


    • मलेरिया


    • खसरा


    लाइफस्टाइल : आप की पर्सनल लाइफ स्टाइल जैसी मर्जी हो लेकिन जब आप गर्भावस्था में होती है तो आपका लाइफस्टाइल प्रेगनेंसी के अनुकूल नही होता है तो मिसकैरेज होना स्वाभविक हो जाता है। आइये जानतें है आपकी उन आदतों को जो गर्भपात का खतरा बढ़ाती है।




    सिगरेट या हुक्का मारने की आदत : प्रेगनेंसी के दौरान सिगरेट की आदत छोड़ देनी चाहिए नही तो इस लत की वजह से मिसकैरेज हो सकता है क्योकि जब महिलायें गर्भवती होने पर सिगरेट या हुक्के के कश का सेवन करती है तो सिगरेट का धुंआ वह उनके गर्भ में आक्सीजन की कमी कर देता है जिसकी वजह से फ़ीटस तक पर्याप्त मात्रा तक में आक्सीजन नही पहुच पाती और प्रेगेन्ट महिला का गर्भपात हो जाता है। इसके अलावा क्रोमोजोम असामान्यता भी सिगरेट सेवन की वजह से आती है।





    गर्भावस्था में कैफीन का अधिक उपयोग : हमारे शरीर को कैफीन,शराब,कॉफ़ी,चाय आदि से सामान्य रूप में मिलती है इसलिए शराब आदि को तो त्याग देना चाहिए तथा कॉफ़ी चाय की मात्रा डॉक्टरी सलाह पर ही लेनी चाहिए। साधारण रूप से एक दिन में 200 मिलीग्राम से अधिक कैफीन का उपयोग की वजह से भी कई बार मिसकैरेज हो जाता है इसलिए डॉक्टरी सलाह के बाद ही कैफीन की मात्रा को अपने लिए चुनना चाहिए। कैफीन के अधिक उपयोग से गर्भनाल के निकलने का जोखिम बढ़ जाता है जो गर्भपात के प्रमुख कारणों में है।




    तनाव पूर्ण लाइफस्टाइल : अगर आपकी लाइफस्टाइल तनाव पूर्ण और चिंता से ग्रस्त रहती है तो गर्भावस्था के दौरान गर्भपात का खतरा बना रहता है। शारीरिक स्वस्थता के साथ-साथ बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए मानसिक रूप से मजबूत और खुश होना अनिवार्य है।




    सही भोजन की परख ना होना : प्रेग्नेंट महिला की डाइट प्लान सामान्य से बिलकुल भिन्न होता है इसलिए एक प्रेग्नेंट महिला को पता होना चाहिए कि उसके हेल्थ के अनुसार उनके लिए कौन से भोजन उपयुक्त है और कौन सा अनउपयुक्त है। अधिक गर्म प्रवृति वाले भोजन फ़ास्ट फ़ूड , मसालेदार,अधपका मीट मछली और संक्रमण युक्त भोजन अधिकतर मिसकैरेज का कारण बनते है इसलिए गर्भावस्था के शुरूआती अवस्था में भोजन का चुनाव बड़ी समझदारी से करना चाहिए।




    गलत दवाइयों का चुनाव : कई बार महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान हल्के बदन दर्द या बुखार अवस्था में बिना डॉक्टरी सलाह के दवाईयां ले लेती है जो उनकी गर्भावस्था बॉडी के अनुकूल नही होती है तो भी गर्भपात हो जाता है इसके अलावा सामान्य बिमारी में डॉक्टर से प्रेगनेंसी की बात छुपाने का कारण भी मिसकैरेज की वजह बनती है।


    कुछ अन्य कारण जिनकी वजह से हो सकता है मिसकैरेज


    • प्रेग्नेंट महिला को किसी तरह का सदमा लगना


    • प्रेगनेंसी के समय गलत सेक्स पोजीसन का चुनाव


    • प्रेगनेंसी के समय फिटनेस की चाह में गलत कसरत का चुनना


    • उछल कूद से सीढियाँ चढना या रोजाना अधिक देर तक ड्राइव करना


    • अधिक समय तक बैठे रहना या फिर खड़े होकर काम करना


    • अधिक हवाई यात्रा करना
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